पाठ्यक्रम: GS2/ अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- हालिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका लंबे समय से चली आ रही तनावपूर्ण परिस्थितियों के बाद पुनः राजनयिक संवाद स्थापित करने के लिए एक प्रारंभिक रूपरेखा पर सहमत हुए हैं।
पृष्ठभूमि
- इस समझौते में संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच एक 14-सूत्रीय समझौता ज्ञापन (MoU) शामिल है, जो तनाव-नियंत्रण, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक नौवहन की पुनर्स्थापना तथा प्रतिबंधों में राहत से संबंधित वार्ताओं के लिए एक रोडमैप प्रस्तुत करता है।
- इसमें लेबनान सहित सभी सैन्य कार्रवाइयों पर तत्काल रोक तथा 60-दिवसीय वार्ता अवधि का प्रावधान भी शामिल है।

ईरान–अमेरिका परमाणु कूटनीति का विकास
- 2015 का परमाणु समझौता: संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) पर ईरान और P5+1 देशों के बीच हस्ताक्षर किए गए थे।
- इसके अंतर्गत ईरान ने प्रतिबंधों में राहत के बदले यूरेनियम संवर्धन को सीमित करने तथा उन्नत निरीक्षण व्यवस्थाओं को स्वीकार करने पर सहमति व्यक्त की थी।
- अमेरिकी वापसी और पुनः बढ़ा तनाव: वर्ष 2018 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने JCPOA से स्वयं को अलग कर लिया तथा ईरान पर पुनः प्रतिबंध लागू कर दिए।
- इसके प्रत्युत्तर में ईरान ने समझौते के विभिन्न प्रावधानों के अनुपालन को धीरे-धीरे कम करना आरम्भ कर दिया।
ईरान–अमेरिका समझौते के संभावित अवसर
- तनाव में कमी से क्षेत्र में सैन्य टकराव तथा प्रॉक्सी संघर्षों की आशंका कम होगी।
- स्थिर परिस्थितियाँ ऊर्जा आपूर्ति को सुचारु बनाए रखेंगी तथा वैश्विक तेल बाजारों में अस्थिरता को कम करेंगी।
- बेहतर सुरक्षा वातावरण संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों में व्यापार, निवेश तथा पुनर्निर्माण गतिविधियों को प्रोत्साहित करेगा।
- भारत के लिए भी अनुकूल क्षेत्रीय परिस्थितियाँ चाबहार बंदरगाह तथा अंतरराष्ट्रीयउत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) के विकास को गति देने हेतु आवश्यक हैं।
चुनौतियाँ
- क्षेत्रीय पक्षकारों के बीच गहरे स्तर पर व्याप्त अविश्वास स्थायी शांति की राह में प्रमुख बाधा बना हुआ है।
- गैर-राज्य सशस्त्र समूहों तथा प्रॉक्सी नेटवर्कों का प्रभाव क्षेत्रीय सुरक्षा को और अधिक जटिल बना सकता है।
- ईरान के परमाणु कार्यक्रम तथा भविष्य की क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था से संबंधित प्रमुख मतभेद अभी भी अनसुलझे हैं।
निष्कर्ष
- ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच यह राजनयिक पहल जटिल भू-राजनीतिक विवादों के समाधान में संवाद की निरंतर प्रासंगिकता को रेखांकित करती है।
- यद्यपि दोनों पक्षों के बीच महत्वपूर्ण मतभेद अभी भी विद्यमान हैं, तथापि क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने तथा पश्चिम एशिया में अधिक शांतिपूर्ण एवं सहयोगात्मक व्यवस्था स्थापित करने के लिए निरंतर कूटनीतिक प्रयास और विश्वास-निर्माण उपाय अत्यंत आवश्यक बने रहेंगे।
Source: TOI
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